भारतीय साधु परंपरा व सन्यासी संघठन के प्रकार और प्रकृति

SUSHIL SHARMA
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नमस्कार दोस्तों ! हिंदी विज़न में आपका स्वागत है। आज हम बात करेंगे "भारतीय साधु परंपरा" की। भारत मे साधुओं का इतिहास हज़ारों साल पुराना है। वेद पुराणों में भी साधु परंपरा के होने के प्रमाण मिलते है। इन्होंने हिन्दू धर्म को काफी हद तक प्रभावित किया। साधु और सन्यासी भी कई प्रकार के होते हैं। सभी के अपने मत, विचारधाराएं, और नियम हैं। आज हम आपको भारतीय साधु से जुड़ी सारी जानकारी विस्तार में आपको देंगे जैसे - "साधु किसे कहते हैं", सन्यासी कितने प्रकार के होते है और हिन्दू धर्म मे साधु सन्यासियों की क्या भूमिका है आदि। 

तो चलिये बिना किसी देरी के जानते हैं कि भारतीय साधु परंपरा क्या है

भारतीय साधु क्या है |What is Indian Sadhus)

साधु कितने प्रकार के होते हैं


वैसे तो साधु शब्द का अर्थ होता है "सज्जन व्यक्ति" इसका मतलब हर वह व्यक्ति जो सज्जन है, दयालु है, परोपकारी और सबकी सहायता करने वाला है वह साधु है। साधु का कोई वेश व नियम नही होता लेकिन आज के समय मे साधु उन्हें कहा जाता है जो सन्यास धारण करते हैं, यज्ञ और तपस्या करते हैं, गेरुए या सफेद वस्त्र पहनते है। ऐसे सन्यासी साधु परंपरा के किसी एक सम्प्रदाय को मानते हैं और उसका ही निर्वाह करते हैं। 

भारतीय साधुओं का इतिहास कुछ सालों के नही बल्कि हज़ारों साल पुराना है। भारतीय इतिहास में हिन्दू धर्म को साधु परंपरा ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया है। भारतीय संस्कृति के अनुसार जो भी व्यक्ति साधुत्व अपनाता है उसे अपने सांसारिक जीवन, और भौतिकता से मुक्त होना होता है तभी वह साधु परंपरा को निभा सकता है। एक साधु को समाज से पूर्ण रूप से मुक्त होना होता है। 

भारतीय साधु का एक सम्प्रदाय जिसे शैव संप्रदाय कहते है उसमें उसमे सन्यास ग्रहण करने से पहले ही व्यक्ति का प्रतीकात्मक रूप से अंतिम संस्कार कर दिया जाता है। जिसका अर्थ है कि वह व्यक्ति समाज के लिए मृत हो जाता है और सन्यासी के रूप में उनका नया जन्म होता है। जबकि वैष्णव सम्प्रदाय के नियम शैव सम्प्रदाय से थोड़ा कम कठोर होते हैं। 
तो आइए जानते है सन्यासी कितने प्रकार के होते हैं 




सन्यासी संगठन व उनके प्रकार

आपने अक्सर साधु और सन्यासियों को देखा होगा लेकिन क्या आपने गौर किया है कि सभी साधु एक जैसे नही होते। साधुओं में भी कई प्रकार होते है। सभी की अपनी वेश भूषा, मान्यतायें, और मत होते हैं। यहां तक कि इनके ईश्वर और उनको मानने का तरीका और नियम भी अलग-अलग हैं। 

सन्यासियों ने हमारी संस्कृति को बनाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। साधु परंपरा में साधु अकेले ही मोक्ष के पथ ओर चलता था लेकिन सन्यासियों ने मठों और आश्रम के द्वारा अपने आप को संगठित करने का प्रयास किया । सबसे पहले बौद्ध फिर इसाई धर्म मे उनके धर्मगुरु की परंपरा को अपनाया उसके द्वारा अपने आप को संगठित करने का प्रयास किया गया।

हिन्दू धर्म में सबसे पहले नौवीं शताब्दी के अंत मे शंकराचार्य ने सन्यासियों के मठों की स्थापना की शुरुआत की। हिन्दू धर्म मे धार्मिक सम्प्रदायों को मुख्यतः दो भागों में विभाजित किया गया है - शैव सम्प्रदाय और वैष्णव सम्प्रदाय । शैव सम्प्रदाय के सन्यासी शंकराचार्य को अपना गुरु मानते है जबकि वैष्णव सम्प्रदाय के लोग रामानुज को अपना गुरु मानते हैं। 

जी एस घुरये ने शैव सम्प्रदाय के सन्यासियों को उनकी प्रकृति के अनुसार निम्नलिखित रूप विभाजित किया है जिसे आप नीचे दिए गए चित्र की सहायता से समझ सकते हैं -

शैव सन्यासियों के प्रकार

वैष्णव सन्यासियों के प्रकार


शैव सम्प्रदाय

सबसे पहले बात करते हैं शैव सन्यासियों के प्रकार की । इसे चार मुख्य भागो में बांटा गया है - 

दसनामी सन्यासी

शैव सन्यासियों में दसनामी सबसे महत्वपूर्ण सम्प्रदाय है। इस सम्प्रदाय की शुरुआत शंकराचार्य ने की। शंकराचार्य ने दसनामी शैवों का संगठन मजबूत करने के लिके भारत मे चार प्रमुख मठों जगन्नाथपुरी, द्वारिका, श्रंगेरी और बद्रीनाथ की स्थापना  की। दसनामी सम्प्रदाय का उद्देश्य धर्म का प्रचार करना और धर्म की रक्षा करना है। 

दसनामी नागा 

दसनामी नागा या नागा साधुओं की प्रकृति थोड़ा अलग है। यह स्वभाव से उग्र और शस्त्र धारण करने वाले होते हैं। यह सन्यासी आजीवन निर्वस्त्र (नंगे) रहते है क्योंकि वह मानते है कि जिस रूप में ईश्वर ने उन्हें जन्म दिया है वह आजीवन उसी स्थिति में रहेंगे। नागा संन्यासी भौतिक जीवन का पूर्ण रूप से परित्याग कर देते हैं। वह अपने शरीर पर चिता की भस्म को लगाते हैं। 

इस सम्प्रदाय को सोलहवीं शताब्दी में मधुसूदन सरस्वती ने नागा सन्यासी को संगठित किया था । इसके पीछे यह उद्देश्य था कि इस लड़ाकू वर्ग की सहायता से बाहरी आक्रमणकारियों से हिंदुत्व की रक्षा की जा सके। 

जोगी सम्प्रदाय

जोगी सन्यासियों को शैव सम्प्रदाय का तीसरा सबसे मुख्य सम्प्रदाय माना जाता है। यह सन्यासी तांत्रिक विद्या और जादू टोने जैसी विद्याओं में निपुण होते हैं। यज्ञ, बलि, सम्मोहन और वशीकरण जैसी विद्याओं का यह अभ्यास करते हैं और उसमें पारंगत होते है। इस सम्प्रदाय को दो भागों में बाटा जाता है - 

  1. आरंभिक सम्प्रदाय
  2. आधुनिक सम्प्रदाय

आरंभिक सम्प्रदाय को भी प्रकृति कर अनुसार दो भागों में बाटा गया है - पाशुपत और कापालिक । ठीक इसी प्रकार आधुनिक सम्प्रदाय को भी नाथपंथी और अघोरपंथी दो संप्रदाय में बाँटा गया है। 

सुधारवादी सम्प्रदाय


शैव सन्यासियों में एक और सम्प्रदाय है जिसे हम सुधारवादी सम्प्रदाय के नाम से जानते हैं। प्रकृति के आधार पर इस सम्प्रदाय को दो भागों में बाँटा गया है - निर्मल और उदासी

इनकी विचारधारा अन्य सम्प्रदायों से काफी अलग है। इस सम्प्रदाय में इस्लामिक और गैर हिन्दू प्रभाव भी देखने को मिलता है। निर्मल सम्प्रदाय मानता है कि राम रहीम एक है, ईश्वर अल्लाह एक है, पुराण तथा कुरान एक है। इन्हें सुधारवादी सन्यासी इसीलिए कहा गया है क्योंकि यह सभी धर्मों को एक समान मानते हैं और मिलजुलकर रहने की भावना रखते हैं। 

वैष्णव सम्प्रदाय

आइये जानते हैं कि वैष्णव सम्प्रदाय क्या है ? वैष्णव सम्प्रदाय भगवान विष्णु और उनके अन्य रूपों की आराधना करते हैं और उन्हें ही अपना इष्ट देव मानते है। यह सम्प्रदाय प्रकृति से सरल और दयालु होता है। इस सम्प्रदाय को भी चार भागों में बांटा गया है और उन सम्प्रदाय का नाम उनके प्रमुख आचार्यों के नाम पर रखा गया है जैसे - 

  1. निम्बार्क सम्प्रदाय ( कुमार सम्प्रदाय ) 
  2. विष्णुस्वामी वल्लभाचार्य सम्प्रदाय ( रुद्र सम्प्रदाय ) 
  3. माधव सम्प्रदाय ( ब्रम्ह सम्प्रदाय )
  4. रामानन्दी सम्प्रदाय



आज आपने जाना 

आशा करते हैं की आपको आज का हमारा यह लेख Indian Sadhus पसंद आया होगा। आज की इस पोस्ट में हमने जाना कि "साधु कितने प्रकार के होते है", नागा साधु क्या होते हैं, अघोरी साधु क्या होते हैं आदि. हमने प्रयास किया है कि अपने इस लेख में आपके सभी सवालों का जवाब दे सकें। फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल बचा जो तो हमें कमेंट में पूछ सकते हैं। 

आपको हमारी यह पोस्ट कैसी लगी यह भी कमेंट में जरूर बताएं। 

धन्यवाद !

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